बुधवार, 20 मार्च 2013


जगत का शिल्पकार

स्वप्न में भी जगता है जगत का शिल्पकार

निराकार का साकार सृजन भौ देखो बारम्बार

स्वप्न में भी जगता है .............

विजनगंधी हवा हो या प्रणयगम पवन ,

अनिद्रित कूल के स्वप्न को देता है आकार

स्वप्न में भी जगता है .............

जग के जड़ धूसर सीने पर

मधुमास हास का करता शीतल फुहार

स्वप्न में भी जगता है ..............

श्रद्धा स्तब्ध थी और मनु भी तो पूरे मौन

वाणी को दिया आकार फिर बही प्रेम रस धार
स्वप्न में भी जगता है ..............

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