जगत का शिल्पकार
स्वप्न में भी जगता
है जगत का शिल्पकार
निराकार का साकार सृजन भौ देखो बारम्बार
स्वप्न में भी जगता है .............
विजनगंधी हवा हो या
प्रणयगम पवन ,
अनिद्रित कूल के स्वप्न को देता है आकार
स्वप्न में भी जगता है .............
जग के जड़ धूसर सीने
पर
मधुमास हास का करता शीतल फुहार
स्वप्न में भी जगता है ..............
श्रद्धा स्तब्ध थी
और मनु भी तो पूरे मौन
वाणी को दिया आकार फिर बही प्रेम रस धार
स्वप्न में भी जगता है
..............
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें