बुधवार, 20 मार्च 2013


मैं किसको जिऊं


सब मेर अपने हैं

ये उदर ये मुख ,

ये दुःख ये सुख

मैं किसको जिऊं......

निशा तम को चाँद को संग लाने का वादा करता है,

या फिर दिवस में

सूर्य के सातवें अश्व की प्रतीक्षा करूं

मैं किसको जिऊं..............

अनुसन्धान बन कर किसे खोजूं?

जो पास है उसे क्यों ढूँढउ ?

म्रत्यु तो आंतिक थाती है

उसे निश दिवस क्यों भोगूँ ?

मैं किसको जिऊं..............

छद्म पिपासा का बन कर ,

जिसे अपनी प्यास का पता नही

या विषम उन्माद का हो कर ,

जिसे अपनी कयास का भान नही .

मैं किसको जिऊं..............

चोंच में मृत्युज अंश दबाये कौए को

जिसे मांश के दुसरे टुकड़े की तलाश है

सुखद,अति सुखद , ऐसी तृप्ति ?

तत्च्हन मेरे भीतर का गणित जागा

अरे द्वितीय हेतु कौए ने प्रथम को त्यागा , अभागा.

मैं किसको जिऊं..............

जगत का शिल्पकार

स्वप्न में भी जगता है जगत का शिल्पकार

निराकार का साकार सृजन भौ देखो बारम्बार

स्वप्न में भी जगता है .............

विजनगंधी हवा हो या प्रणयगम पवन ,

अनिद्रित कूल के स्वप्न को देता है आकार

स्वप्न में भी जगता है .............

जग के जड़ धूसर सीने पर

मधुमास हास का करता शीतल फुहार

स्वप्न में भी जगता है ..............

श्रद्धा स्तब्ध थी और मनु भी तो पूरे मौन

वाणी को दिया आकार फिर बही प्रेम रस धार
स्वप्न में भी जगता है ..............

सोमवार, 11 मार्च 2013

कविता - काल द्वंद्व


काल द्वंद्व

मानव के भीतर का द्वंद्व

अंतर्नाद कर रहा है

माथे की लकीरों के बीच

गहरे विश्वास के साथ छटपटा रहा है

कि समय का कोई तो घोड़ा

बगल से गुजरेगा ,

जिसकी पीठ पर काठी तो होगी,

पर सवार नही ,

और मैं झट चढ़ जाऊंगा ,

मस्जिद और शिवाले की ओर बढ़ जाऊंगा

रोंदते हुए दृश्य और अदृश्य

आस्थाओं को कुचलते कुलीन विचारों सदृश !