काल द्वंद्व
मानव के भीतर का द्वंद्व
अंतर्नाद कर रहा है
माथे की लकीरों के बीच
गहरे विश्वास के साथ छटपटा रहा है
कि समय का कोई तो घोड़ा
बगल से गुजरेगा ,
जिसकी पीठ पर काठी तो होगी,
पर सवार नही ,
और मैं झट चढ़ जाऊंगा ,
मस्जिद और शिवाले की ओर बढ़ जाऊंगा
रोंदते हुए दृश्य और अदृश्य
आस्थाओं को कुचलते कुलीन विचारों सदृश !
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